TO READ AND TO THINK
Shaher ke dukaNdaaro, kaarobar-e-ulfat meN
Sood kya hai ziyaN kya hai tum na jaan paao ge
Koi kaise milta hai, pool kaise khilta hai
AaNkh kaise jhukti hai, saaNs kaise rukti hai,
Wasl ka sukoon kya hai, hijr ka junooN kya hai,
Husn ka fusooN kya hai, Ishq ka darooN kya hai
Tum mareez-e -daanayi, maslehat ke shaidaayi,
Raah-e-gumrahaN kya hai, tum na jaan paao ge.
Zakahm kaise lagte hain, daagh kaise jalte hain,
Dard kaise hota hai, koyi kaise rota hai,
Aah kya hai fughaN kya hai tum na jaan paao ge
(From Khawateen Digest, Saadia Hameed Chaudhari Sep/ 2010 pp64)
A shared blog hosted by Mohd. Saleem Khan, Mazhar Masood and Shakil Akhtar to pour out their experiences of life span of about 65 years each and share memories of past good or bad with each other as well as with all viewers of this blog.
Thursday, 15 December 2011
Sunday, 4 December 2011
अता उल हक कासमी के अक़वाल
سفید پوش وہ ہے جو ماسی برکتے کے تندور پر روٹی کھاتا ہے اور فائیو سٹارہوٹل کے سامنے کھڑے ہو کر خلال کرتا ہے - سیاست دان وہ ہے جو فائیو سٹارہوٹل میں کھانا کھاتا ہے اور ماسی برکتے کے تندور کے سامنے کھڑے ہو کر خلال کرتا ہے
ضمیر انسان کو گناہ سے نہیں روکتا - صرف گناہ کا مزہ کرکرا کرتا ہے.
اپنی بیوی سے رومانی گفتگو کرنا ایسا ہی ہے جیسے کویی ایسی جگہ کھجلاہے جہاں کھجلی نا ہو رہی ہو -
(عطاالحق قاسمی )
ضمیر انسان کو گناہ سے نہیں روکتا - صرف گناہ کا مزہ کرکرا کرتا ہے.
اپنی بیوی سے رومانی گفتگو کرنا ایسا ہی ہے جیسے کویی ایسی جگہ کھجلاہے جہاں کھجلی نا ہو رہی ہو -
(عطاالحق قاسمی )
Friday, 2 December 2011
पछतावे
आप बीती
आज हम ने फेस बुक पर एक बच्चे की रोती हुई पिक्चर देखि वोह किसी के डांटने पर रो रहा था. हमें अपना ज़माना याद आ गया . अब सोचते हैं की हम ने भी बच्चों पर डांट डपट से काम लिया था। एक बार कराची में (१९८७) हम ने समेरा, मेरी बड़ी बेटी, का आडियो कसेट तोड़ दिया था। वह गाने सुन रही थी और हम सो नहीं पा रहे थे, उस का वह चेहरा हमें आज तक याद है, दुःख भरा, अफसुर्दा , और बेबस । हम अक्सर याद करके अपने आप को मलामत करते हैं। वह उस समय १३ वर्ष की थी ।
एक बार हम सउदी अरब गये उमरा करने। मक्काह से मदीना जाते हुए हम अगली सीट पर ड्राईवर के साथ थे और बीवी और दोनों बच्चे पीछे। अरबी ड्राईवर बहोत ही जंगली था और घुस्सीला। हर दो मिनट पर वह बाहर थूकता था और साथ में बहोत ही भयानक अरबी गाने लगा रखे थे। साथ में वह ताली बजा बजा कर खुद भी बेसुरा गाता था । सारे रासते हमारे कान और दिल पक गये । हम को लगा क हम उसका कैसेट निकाल कर बाहर खिड़की के फ़ेंक दें। लेकिन सोचा की यह अरबी हमारे पासपोर्ट बाहर फ़ेंक दे गा। और हम को वह याद आया की हमने समेरा का कैसेट तोड़ दिया था। हम ने अल्लाह से माफ़ी मांगी और समेरा को भी दिल में प्यार किया। समेरा उस वक़्त हमरे साथ नहीं थी, वह लन्दन में पढ़ रही थी
यह १९९८ की बात है ।
हम को लगा की हम बहोत ही डरपोक हैं , कमज़ोर को मारते हैं और ज़बर दस्त से डरते हैं।
आज हम ने फेस बुक पर लिखा की बच्चों हमें माफ़ करदो
आज हम ने फेस बुक पर एक बच्चे की रोती हुई पिक्चर देखि वोह किसी के डांटने पर रो रहा था. हमें अपना ज़माना याद आ गया . अब सोचते हैं की हम ने भी बच्चों पर डांट डपट से काम लिया था। एक बार कराची में (१९८७) हम ने समेरा, मेरी बड़ी बेटी, का आडियो कसेट तोड़ दिया था। वह गाने सुन रही थी और हम सो नहीं पा रहे थे, उस का वह चेहरा हमें आज तक याद है, दुःख भरा, अफसुर्दा , और बेबस । हम अक्सर याद करके अपने आप को मलामत करते हैं। वह उस समय १३ वर्ष की थी ।
एक बार हम सउदी अरब गये उमरा करने। मक्काह से मदीना जाते हुए हम अगली सीट पर ड्राईवर के साथ थे और बीवी और दोनों बच्चे पीछे। अरबी ड्राईवर बहोत ही जंगली था और घुस्सीला। हर दो मिनट पर वह बाहर थूकता था और साथ में बहोत ही भयानक अरबी गाने लगा रखे थे। साथ में वह ताली बजा बजा कर खुद भी बेसुरा गाता था । सारे रासते हमारे कान और दिल पक गये । हम को लगा क हम उसका कैसेट निकाल कर बाहर खिड़की के फ़ेंक दें। लेकिन सोचा की यह अरबी हमारे पासपोर्ट बाहर फ़ेंक दे गा। और हम को वह याद आया की हमने समेरा का कैसेट तोड़ दिया था। हम ने अल्लाह से माफ़ी मांगी और समेरा को भी दिल में प्यार किया। समेरा उस वक़्त हमरे साथ नहीं थी, वह लन्दन में पढ़ रही थी
यह १९९८ की बात है ।
हम को लगा की हम बहोत ही डरपोक हैं , कमज़ोर को मारते हैं और ज़बर दस्त से डरते हैं।
आज हम ने फेस बुक पर लिखा की बच्चों हमें माफ़ करदो
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