Wednesday, 9 July 2014

ख़फ़ा

तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बरहम हैं दोस्तों 
अब हो गया यक़ीं कि बुरे हम हें  दोस्तों 


शिददते  दर्द  से शरमिंंदा नहीं मेरी वफ़ा 
जिनसे रिश्ते गहरे हों वह दर्द भी गहरे देते हैं


ज़ख़्म लगते ही नहीं उसकी इजाज़त के बग़ैर 
और फिर ज़ख़्म को मरहम भी वही देता   है


हमारे बाद करेगा हमारी क़दर । जहाँ 
हमारी मौत  हमारी हयात से अहम 

Saturday, 5 July 2014

अलग अलग विचार और अशार

कौन करता है यहाँ  वक़्त के काँटे का इलाज
लोग तो ज़ख़्म को  नासूर बना देते ।  हैं             

कर के वफ़ा हम आरजी पछताते हैं । बहुत
वह अपनी जफ़ाओं पे पशेमान नहीं ।  हैं 


हम समुंदर की तरह  जरफ बड़ा रखते हैं
दिल में तूफ़ान तो चेहरे पे सुकून होता हैं



Monday, 9 June 2014

दर्द

वो दर्द जो दुश्मन के हवाले से मिला है
कम उस से है जो चाहने वालेे से मिला है


आप ग़ैरों की बात करते हैं हम ने अपने भी आज़माए हैं
लोग काँटों से बच कर चलते हैं हमने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं