Monday, 1 September 2014

वफ़ा

करके वफ़ा हम अर्ज़ी पछताते हैं बहुत
वो अपनी जफ़ाओं पे पशेमान नहीं हैं 


ग़म नहीं मुझ से मुहब्बत नहीं करता कोई 
क्या ये कम है कि नफरत नहीं करता कोई


कतील उस ने अगर कह दिया बुरा भी तो क्या 
यही बहुत है मुझे याद कर रहा है  कोई

वक़्त तेरी यह अदा मैं आज तक समझा नहीं 
मेरी दुनिया क्यों बदल दी मुझ को क्यों बदला नहीं 

Thursday, 14 August 2014

तूफ़ान

अपने सीने में समेटे हुए कितने तूफ़ान 
मैं हूँ ख़ामोश ज़माने में समुंदर की तरह 

ऐ ख़ुदा लोग बनाए थे अगर पथर के
मेरे एहसास को शीशा न बनाया होता

मैं अपने आप में खोया हुआ सा रहता हूँ 
ये सोचना भी नहीं साहिबे ग़रूर हूँ मैं 


Wednesday, 23 July 2014

वक़्त

वक़्त भी लेता है न जाने करवटें कितनी,
उम्र इतनी तो न थी जितना सबक़ सीख लिया,