ख़ुद को निगाहें फ़र्ज़ में रुसवा न कीजिए
A shared blog hosted by Mohd. Saleem Khan, Mazhar Masood and Shakil Akhtar to pour out their experiences of life span of about 65 years each and share memories of past good or bad with each other as well as with all viewers of this blog.
Monday, 6 October 2014
ज़िन्दगी
कब तक रहेगी हम पे मेहरबाँ ज़िन्दगी
थोड़े दिनों की और है मेहमान ज़िन्दगी
कही किसी से न रूदादे ज़िन्दगी मैं ने
गुज़ार देने की शै थी गुज़ार दी मैं ने
बजाहिर जो बहुत अच्छे भले मालूम होते हैं
वो अन्दर से बहुत टूटे हुऐ मालूम होते हैं
बेवफ़ाई की तोहमत सर हमारे है लेकिन
बात जब बिगड़ती है बात हम बनाते हैं
दिल में क्या क्या सोच रखा था पर वैसा नहीं हुआ
दुनिया भी मेरे हाथ न आई कोई भी मेरा नहीं हुआ
Saturday, 4 October 2014
पत्थर
नहीं है ग़म मुझे ज़ख़्मों का बस यही ग़म है
कि मेरे अपने थे पत्थर उठाने वालों में
आँख से होकर मेरे दिल में उतरता कौन है ?
रूह के इस शहर वीरां से गुज़रता कौन है ?
ये शिददते एहसास भी मर जाए तो अच्छा
कमबख़्त यही मुझको परेशान करें है
हम तो बदनाम हैं बस यूँ ही
लोग दुनिया में क्या नहीं करतेौ
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