Thursday, 14 August 2014

तूफ़ान

अपने सीने में समेटे हुए कितने तूफ़ान 
मैं हूँ ख़ामोश ज़माने में समुंदर की तरह 

ऐ ख़ुदा लोग बनाए थे अगर पथर के
मेरे एहसास को शीशा न बनाया होता

मैं अपने आप में खोया हुआ सा रहता हूँ 
ये सोचना भी नहीं साहिबे ग़रूर हूँ मैं 


Wednesday, 23 July 2014

वक़्त

वक़्त भी लेता है न जाने करवटें कितनी,
उम्र इतनी तो न थी जितना सबक़ सीख लिया,




Saturday, 12 July 2014

MASLEHAT

तसलीम कर लिये हैं  नाकर्दा जुर्म भी 
कुछ मसलेहत थी बात बढ़ने से डर  गए 


मैं जो  तनहा हुआ बढ़ने लगी शोहरत मेरी 
आ गई काम मेरे मुझसे बग़ावत मेरी 


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